Three accused, including Dhyan Singh, acquitted in kidnapping and extortion case; fast-track court finds no

अपहरण और जबरन वसूली मामले में ध्यान सिंह समेत तीन आरोपी बरी, साक्ष्यों के अभाव में फास्ट ट्रैक कोर्ट का फैसला

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अपहरण और जबरन वसूली के एक मामले में चंडीगढ़ की एडीजे-कम-फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में तीन युवकों को बरी कर दिया। यह फैसला अतरिक्त एवं जिला सत्र न्यायाधीश (एडीजे) डॉ. हरप्रीत कौर की अदालत ने सुनाया।


अदालत ने ध्यान सिंह, रमनजीत और मनजीत सिंह को भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 115(2), 140(2), 308(2), 351(2) और 3(5) के तहत लगाए गए सभी आरोपों से बरी कर दिया। मामला कथित तौर पर 29 अप्रैल 2025 को हुई अपहरण और जबरन वसूली की घटना से संबंधित था।


अभियोजन पक्ष का मामला


सेक्टर-31 थाना पुलिस में दर्ज एफआईआर के अनुसार, 20 वर्षीय शिकायतकर्ता राहुल ने आरोप लगाया था कि वह पावर ग्रिड, हल्लोमाजरा में ऑटो की तलाश में गया था। इसी दौरान एक सफेद रंग की कार उसके पास आकर रुकी, जिसमें सवार तीनों आरोपियों ने उसे जबरदस्ती कार में खींच लिया।


शिकायतकर्ता के अनुसार, आरोपियों ने उसे बंदूक जैसे हथियार से धमकाया, बार-बार मारपीट की और 5 लाख रुपये की फिरौती मांगी। उसने अपनी बहन को फोन कर पैसों की मांग की। शिकायतकर्ता की बहन खरड़ स्थित एचपी पेट्रोल पंप पर 1,30,000 रुपये लेकर पहुंची, जिसके बाद आरोपियों ने कथित तौर पर राहुल को उसकी बहन के हवाले कर दिया


बचाव पक्ष की दलीलें


मुख्य आरोपी की ओर से एडवोकेट मनदीप कुमार और एडवोकेट कशिश जैन ने अभियोजन पक्ष के मामले में कई गंभीर खामियां और विरोधाभास उजागर किए।


एडवोकेट मनदीप कुमार ने अदालत को बताया कि:आरोपियों से कोई पिस्तौल या पिस्तौल जैसा हथियार कभी बरामद नहीं किया गया।
अभियोजन का मुख्य गवाह शिकायतकर्ता पहचान परेड में असफल रहा।


शिकायतकर्ता के कथित विवरण के आधार पर न तो कोई स्केच तैयार किया गया और न ही वह अदालत में किसी भी आरोपी की पहचान कर सका।


वहीं, एडवोकेट कशिश जैन ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष के अनुसार कथित रूप से दी गई 1,30,000 रुपये की जबरन वसूली की रकम भी कभी आरोपियों से बरामद नहीं हुई, जिससे जबरन वसूली का आरोप टिक नहीं पाता।


मेडिकल साक्ष्य भी पक्ष में नहीं


सह-आरोपियों की ओर से एडवोकेट गुरसीरत सिंह और एडवोकेट इशमनजीत कौर ने अदालत को बताया कि मेडिकल रिपोर्ट भी अभियोजन पक्ष के कथन का समर्थन नहीं करती। रिपोर्ट में शिकायतकर्ता के शरीर पर किसी प्रकार की चोट या हमले के निशान नहीं पाए गए, जिससे मारपीट के आरोप संदिग्ध हो जाते हैं।


अदालत का निष्कर्ष


अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलें सुनने तथा प्रस्तुत कानूनी मिसालों पर विचार करने के बाद अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। रिकॉर्ड पर कोई ठोस और भरोसेमंद साक्ष्य न होने के चलते अदालत ने तीनों आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया।